उत्तर प्रदेशलखनऊ

नवरात्रि के तीसरे दिन शक्ति पीठ मां चंद्रिका देवी के दरबार में भक्तों की भारी भीड़

ग्लोबल टाइम्स 7
न्यूज़ नेटवर्क
उन्नाव
फुन्नी त्रिपाठी

उन्नाव स्थित गंगा तट पर बक्सर में माँ के नाम से प्रसिद्ध है. इसका उल्लेख मार्कण्डेय पुराण और भविष्य पुराण में भी पाया जाता है. कहा जाता है कि सतयुग के इस तीर्थ में माँ चण्डी के दरबार में ही राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य को मेधातिथि नामक ऋषि ने सबसे पहले दुर्गासप्तशती का ज्ञान दिया था. यहाँ पर इन तीनो की तपोभूमि के रूप में टीले प्रसिद्ध थे. इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि दुर्गासप्तशती के श्लोकों का प्रथम संकलन भी यहीं पर हुआ था. बता दें कि त्रेता युग मे विश्वामित्र ने, द्वापर में ऋषि बक ने भी यहीं पर तपस्या की थी.दरअसल, बक्सर के राव मर्दन सिंह के समय मे सत्रहवीं शताब्दी में रीति कालीन आचार्य सुखदेव मिश्र ने भी यही पर चण्डी की साधना की थी और उन्हें अनेक चमत्कार प्राप्त थे. ऐसे में आधुनिक युग मे संत अनंग बोधाश्रम, शंकराचार्य कृष्ण बोधाश्रम, स्वामी सत्संगानन्द जी, लक्कड़ बाबा एवं संत शोभन सरकार जी ने भी बक्सर में अपनी तपस्या करके इसे धन्य किया था. जहां पर अमर शहीद राव रामबक्श सिंह, महाप्राण निराला और सरस्वती के सम्पादक पण्डित देवीदत्त शुक्ल भी इसी चण्डी पीठ के उपासक थे.

द्वारपाल के रूप में जय-विजय की प्रतिमाएं है प्रतष्ठित
वहीं, आज भी बैसवारा क्षेत्र में ऐसी मान्यता है कि इस पीठ के दर्शन से सभी क्लेश कट जाते है. चाहे नयी बधू का आगमन हो, मुण्डन-छेदन हो, या कोई नया वाहन खरीदा जाए तो उसे माँ चण्डी के दरबार में ले जाना यहाँ की लोक परम्परा बन गई है. यहाँ पर माँ चण्डी के विग्रह के रूप में कोई प्रतिमा नही है अपितु दो प्राचीन शिला खण्ड रखे हुए है. जोकि यह बताते है कि यह आस्था केन्द्र उस समय का है, जब मनुष्य प्रतिमा निर्माण की कला नही जानता था. हालांकि मन्दिर की सीढ़ियों पर प्रवाहित माँ गंगा के जल से आचमन कर ऊपर जाने पर मन्दिर के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ दुर्गासप्तशती के मंत्र पत्थरों पर लिखे हुए है. वाचन करते हुए भक्त देवी के दरबार मे पहुँच जाते है. इस दौरान द्वारपाल के रूप में जय-विजय की प्रतिमाएं है और गणपति भी प्रतिष्ठित है।मां के दर्शन के लिए देश-विदेश से आते हैं पर्यटक
बता दें कि वैसे तो पूरे सालभर यहाँ देश-विदेश के लोग आते रहते है. लेकिन चैत्र व शारदीय नवरात्र में उन्नाव,रायबरेली, लखनऊ, कानपुर, फतेहपुर तथा बुन्देलखण्ड के भक्तों का भारी मेला जुटता है. जोकि रात दिन लगा रहता है. इस दौरान लोकगीतों में आल्हा गायक भी प्रारम्भ में यही सुमिरनी गाते है कि ‘सुमिरि चंदिका बक्सर वाली,नीचे बहै गंग की धार’ और मन्दिर में बज रहे घण्टों से प्रतिक्षण यही प्रतिध्वनित होता रहता है कि- या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

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