उत्तर प्रदेश

वंदे मातरम किसी मजहब के खिलाफ नहीं, यह राष्ट्र की साझा चेतना है: कुंवर रघुराज प्रताप सिंह”

  लखनऊ

मुख्य समाचार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान सोमवार को उस समय माहौल राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत हो गया, जब जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुंवर रघुराज प्रताप सिंह ‘राजा भैया’ ने वंदे मातरम के सम्मान में अपना वक्तव्य दिया। राजा भैया ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस विषय को राष्ट्र की साझा चेतना का प्रश्न बताया और उन लोगों को आड़े हाथों लिया जो राष्ट्रगीत के गायन पर आपत्ति जताते हैं।
क्रांतिकारियों के बलिदान का दिया हवाला
अपने संबोधन में राजा भैया ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए कहा कि वंदे मातरम किसी व्यक्ति के कहने से नहीं, बल्कि बलिदानों की नींव पर राष्ट्रगीत बना है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, “खुदीराम बोस हों, मदन लाल धींगरा हों या पंडित राम प्रसाद बिस्मिल—इन सभी महान सपूतों ने अलग-अलग प्रांतों में जन्म लिया और अलग-अलग जगहों पर फांसी पाई, लेकिन सबके अंतिम शब्द एक ही थे—वंदे मातरम।” उन्होंने तर्क दिया कि जब देश महासंकट में था, तब इसकी सर्वव्यापकता पर कोई सवाल नहीं था, तो आज क्यों?
संविधान और साझा चेतना का प्रश्न
राजा भैया ने सदन को याद दिलाया कि वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा उसी संविधान सभा ने दिया जिसमें देश के सबसे महान और ज्ञानी व्यक्तित्व शामिल थे। उन्होंने कहा कि जो लोग संविधान की दुहाई देते हैं, उन्हें संविधान सभा के इस निर्णय का भी सम्मान करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि वंदे मातरम किसी धर्म या मजहब के विरोध में नहीं है, बल्कि यह मातृभूमि की वंदना है।
सदन में ‘मौन’ रहने वालों पर साधा निशाना
विधानसभा में कुछ सदस्यों के आचरण पर सवाल उठाते हुए राजा भैया ने कहा कि यह अत्यंत कष्टकारी है कि जब सदन में वंदे मातरम का गान होता है, तो कुछ सदस्य मौन रहते हैं या सदन से बाहर चले जाते हैं। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा, “वंदे मातरम दिल से गाना चाहिए, डंडे से नहीं, लेकिन जो अपने राष्ट्रगीत को दिल से नहीं गा सकता, वो फिर क्या गाएगा?”
मतदाताओं को दिया संदेश
राजा भैया ने अपने भाषण का समापन एक गंभीर चेतावनी और संदेश के साथ किया। उन्होंने कहा कि सदन की कार्यवाही को पूरा प्रदेश देख रहा है। आने वाले चुनावों में मतदाताओं को यह भी तय करना होगा कि कौन राष्ट्रगीत के साथ खड़ा है और किसे इससे आपत्ति है। उन्होंने अन्य सदस्यों से भी आह्वान किया कि वे स्पष्ट करें कि आखिर इस कालजयी रचना पर आपत्ति का आधार क्या है।….. संजय सिंह!

Global Times 7

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