उत्तर प्रदेशलखनऊ

उत्तर प्रदेश में अब त्रिकोणीय मुकाबला होना तय

आलोक मिश्रा
ग्लोबल टाईम्स 7
न्यूज नेटवर्क
लखनऊ।
बसपा के एकला चलो की राह से इंडिया गठबंधन की डगर कठिन होती दिखाई दे रही है। उसके अकेले उतरने से वोटों का बंटवारा होने से रोक पाना आसान नहीं होगा और भाजपा फायदा उठाने का प्रयास करेगी। पिछले लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा के एक साथ होने से भाजपा गठबंधन को कुछ सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा था।
मुस्लिम दांव पड़ेगा भारी मायावती दलितों के साथ मुस्लिमों को हमेशा लुभाती रही हैं। वह कहती रही हैं कि विधानसभा चुनाव में सपा के साथ जाने पर मुस्लिमों का वोट खराब हो गया। बसपा का अगर साथ दिया होता तो भाजपा सरकार न बना पाती। मायावती ने विधानसभा और निकाय चुनाव में सर्वाधिक मुस्लिमों पर दांव लगाती रही हैं। यह माना जा रहा है कि बसपा यूपी की 80 लोकसभा सीटों में अधिकतर मुस्लिम, दलित के साथ ओबीसी कार्ड खेलेगी। ‘इंडिया’ गठबंधन भी इसी जाति समीकरण के सहारे आगे बढ़ाने की सोंच रहा है। ऐसे में मायावती द्वारा मैदान में अकेले उतरने पर इन जातियों के वोट बैंक में बंटवारा तय माना जा रहा है।
सीटों में होगा उलटफेर वर्ष 2019 में बसपा को 38 और सपा को 37 सीटें मिली थीं। इनमें बसपा 10 और सपा पांच सीटों पर जीती थी। श्रावस्ती की सीट पर तो चौंकाने वाला परिणाम आया था। बसपा के राम शिरोमणि भाजपा के दद्दन मिश्रा को मात्र 5320 वोटों से हराकर विजयी हुए थे। दोनों पार्टियों के साथ होने से मुस्लिम, दलित और यादव वोटों का अधिक बंटवारा भी नहीं हो पाया था।

सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले का क्या होगा ?

बसपा वर्ष 2007 में यूपी में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई थी। तब यह तर्क दिया गया था कि बसपा को सोशल इंजीनियरिंग का फायदा मिला। उसे अपर कास्ट के लोगों ने भी खुलकर वोट किया। मायावती अब स्वयं यह कह रही हैं कि गठबंधन पर उन्हें इस वर्ग का वोट नहीं मिलता है। ऐसे में क्या मायावती कांशीराम के फार्मूले पर वापस आ रही हैं? यह देखना दिलचस्प होगा कि अपने कोर वोट के अलावा मायावती सवर्ण वोट के लिए किस तरह दावेदारी करेंगी।

Global Times 7

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