कब तक प्रतिनिधि करते रहेंगे उनके पद का दुरूपयोग,कब लेंगे सुध जिम्मेदार अधिकारी !

घूंघट के अंदर आज भी परधान जी
जब सजनी बनी प्रधान,डर काहे का !
कहीं सरपंच के पतिदेव,कहीं देवरा,तो कहीं बेटों, ससुर जी की छाई हुकूमत, दरबारी बन रहे बेचारे सेक्रेटरी !
Global Times 7
News Network
Lucknow Uttar Pradesh
ALOK MISHRA
(MD Assistant) !
पंचायती राज विधेयक में जहाँ नारी सशक्तिकरण को लेकर महिला आरक्षण का प्रावधान हैं, जिससे महिला नेतृत्व को बढ़ावा मिलेगा सरकार की मंसा के विपरीत अधिकारी और कर्मचारी मूक दर्शक बने हुए हैं, यूँ तो ये खेल पूरे जनपद में चल रहा हैं एक भी महिला प्रधान किसी भी मीटिंग में नहीं जाती, उनके प्रतिनिधि ही कोरम पूरा कर देते हैं,
मालूम हो कि कानपुर नगर जनपद में दस विकास खंडों में लगभग 590 ग्राम पंचायतों की यदि बात की जाए तो आधे ज्यादा ग्राम पंचायतों में यही हाल चलता हुआ दिखाई पड़ता नजर आयेगा । जो
विकासखंडों की ग्राम पंचायतों में जमकर पंचायतीराज में नारी सशक्तिकरण का मखौल उड़ रहा है, और प्रशासनिक अधिकारी भी मजबूरन धृतराष्ट्र की भूमिका में हैं.

आखिर कब निकलेगी महिला प्रधान घर से बाहर –
आलम यह है कि कहीं प्रधान बनी भौजी के देवर प्रतिनिधि बने घूम रहे हैं, तो कहीं प्रधान के ससुर तो, कही प्रधान पति व बेटे भी खुद को ग्राम प्रधान कहकर गौरवान्वित ही कर रहे हैं गावों में होने वाले कार्यक्रमों बल्कि सुगंधित फूलों के मालाएं पहन रहे हैं। जिसके चलते ऐसे में प्रधान पुत्र भी कहां पिछड़ने वाले हैं, वे भी ब्लाक में परधानी का ठेला सजा लिए हैं। पंचायतीराज का सबसे बड़ा मखौल यह उड़ रहा है कि कुछ पथभ्रष्ट सेकेट्री भी इन्हीं मुखबोले प्रतिनिधियों के दरबारी बन बैठे हैं जो जगजाहिर है।

कब तक उनके प्रतिनिधि करते रहेंगे उनके पद का दुरूपयोग,कब लेंगे सुध जिम्मेदार अधिकारी !
पंचायतीराज व्यवस्था में चुने गए जनप्रतिनिधि को अपना प्रतिनिधि नामित करने की व्यवस्था नहीं है। फिर भी कुछ ग्राम प्रधान अपने परिवार के सदस्यों को कार्यभार सौप देते हैं। जहां उक्त मुखबोले प्रतिनिधि अधिकारियों के सामने प्रधान बनकर पहुंचने लगते हैं। प्रस्ताव की आड़ में लूट-खसोट की शिकायतें भी बढ़ती है लेकिन प्रधानजी अंजान बनी रहती हैं। ज्यादातर महिला जनप्रतिनिधि यह रवैया अपनाती हैं. हालांकि शासन द्वारा इस पर रोक लग चुका है। इसके बाद भी यह खेल व चलन बरकरार है। सरकारी बैठकों में अक्सर प्रधान या बीडीसी वह सदस्य की जगह इनके प्रतिनिधि प्रतिभाग करते हैं।
ज्यादातर सरपंच जी के हस्ताक्षर भी बड़बोले जनप्रतिनिधि ही करते हुए देखे जा रहे!
हद तो तब समझिए जब कुछ गांव के प्रतिनिधि प्रधान का हस्ताक्षर भी खुद कर देते हैं मोहर उनके जेब में रहता हैं, और ग्रामपंचायत अधिकारी भी इन्हीं मुहबोले प्रतिनिधियों के इशारे पर चलने लगते हैं और दरबारी बन जाते हैं। ग्रामीणों की समस्याओं पर ध्यान देना तो छोड़िए बल्कि कुछ प्रस्तावों में यही सेकेट्ररी अपनी जेब गर्म करते हुए मनमाफिक ठेकेदारों को काम देते हैं। विकास कार्यों में भ्रष्टाचार की भनक किसी को न लगे इसीलिए किसी कार्ययोजना का फलक बिना लगवाए ही कार्य करवाते रहते हैं।
खैर कहावत है ‘”सईया हमरा जब बना कोतवाल, तो अब डर काहे का'” उसी तर्ज पर लिखना पड़ा ‘सजनी बनी प्रधान, अब डर काहे का’ ।
यदि नहीं लिया संज्ञान ,भविष्य में होगी गले की फांस!
अगर अधिकारियो ने इसका संज्ञान नहीं लिया तो ऐसी स्थिति में पंचायतीराज का यह मखौल संबंधित लोगों के गले की फांस भविष्य में बनना तय हो जाएगा।






