छप के बिकते थे जो अख़बार, अब बिक के छपते हैं — और हम चुप हैं

एक लेख एक विचार
यह पंक्ति किसी कवि की कल्पना नहीं, यह भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की आत्मस्वीकृति है। एक समय था जब अख़बार सत्ता के दरवाज़े खटखटाते थे। आज अख़बार पहले दरवाज़ा देखते हैं—किसका है, कितना भारी है, और कितना भुगतान करेगा। कलम कभी प्रश्न पूछती थी। अब वह पहले रेट कार्ड देखती है।
यह पतन किसी एक दिन नहीं हुआ
यह कहना आसान है कि मीडिया “बिक गया”। लेकिन सच्चाई ज़्यादा असहज है—मीडिया को धीरे-धीरे यह सिखाया गया कि चुप रहना ही समझदारी है।
पहले दबाव आया, फिर डर आया, फिर समझौता आया, और अंततः—आत्म-सेंसरशिप आदत बन गई। आज किसी न्यूज़रूम में ताले नहीं लगते, लेकिन बहुत से दिमाग़ों पर ताले खुद लग चुके हैं।
## पत्रकारिता से मैनेजमेंट तक का सफ़र
आज न्यूज़रूम में संपादक नहीं, प्रेज़ेंटेशन मैनेजर हैं। ख़बर अब इस आधार पर नहीं चलती कि वह कितनी ज़रूरी है, बल्कि इस आधार पर चलती है कि—
* किस मंत्री को नाराज़ करेगी
* किस कॉरपोरेट को असहज करेगी
* कौन सा विज्ञापन रुक सकता है
जो सवाल सत्ता से पूछे जाने चाहिए, वे अब प्रतिपक्ष से पूछे जाते हैं—क्योंकि वह सुरक्षित है।
कलम और सिक्के का यह कार्टून क्यों बेचैन करता है?
क्योंकि वह हम सबका आईना है। उसमें कोई नेता नहीं दिखता, कोई पार्टी नहीं दिखती, कोई सरकार नहीं दिखती—सिर्फ़ एक सिक्का दिखता है, जो तय करता है कि कलम कहाँ जाएगी।
यह सिर्फ़ मीडिया का अपराध नहीं, यह उस समाज की भी हार है जो मुफ्त में झूठ देखना चाहता है और सच के लिए भुगतान नहीं करना चाहता।
सबसे खतरनाक सवाल: क्या हम सच चाहते भी हैं?
हम सोशल मीडिया पर चिल्लाते हैं— “मीडिया बिक गया!”
लेकिन—
* कितने लोग ईमानदार अख़बार की सदस्यता लेते हैं?
* कितने लोग सच बोलने वाले पत्रकार के साथ खड़े होते हैं?
* कितने लोग असुविधाजनक खबर पढ़ना चाहते हैं?
हम वही मीडिया पाते हैं, जिसे हम सहन करने को तैयार होते हैं।
लोकतंत्र की खामोश मौत
लोकतंत्र अचानक नहीं मरता। वह धीरे-धीरे दम तोड़ता है—जब सवाल गायब हो जाते हैं, जब बहस स्क्रिप्टेड हो जाती है, जब आलोचना को देशद्रोह कहा जाने लगता है। और तब अख़बार सिर्फ़ सूचना नहीं छापते, वे सहमति का निर्माण करते हैं।
## पत्रकारों से नहीं, पत्रकारिता से सवाल है
यह लेख किसी एक एंकर, किसी एक चैनल, किसी एक अख़बार के ख़िलाफ़ नहीं है।
यह सवाल है— क्या पत्रकारिता अब भी जनपक्ष में खड़ी है, या सिर्फ़ सत्ता के आसपास मंडरा रही है? अगर कलम डर से चल रही है, तो वह कलम नहीं—एक औज़ार है।
## अब भी देर नहीं हुई है
इतिहास गवाह है—हर दौर में कुछ लोग रहे हैं, जिन्होंने नौकरी से ऊपर नैतिकता को चुना।
आज भी जरूरत है—
* ऐसे पत्रकारों की
* ऐसे संपादकों की
* और ऐसे पाठकों की
जो कह सकें— “हमें बिके हुए सच से बेहतर असुविधाजनक सच्चाई चाहिए।”
अंतिम बात (जो आत्मा से कही जा रही है)
“जिस दिन अख़बार पूरी तरह बिक गए, उस दिन सत्ता नहीं—हम सब हारेंगे।” क्योंकि तब न सवाल बचेंगे, न जवाब, और न ही लोकतंत्र—सिर्फ़ एक महँगा भ्रम।
कलम अभी पूरी तरह गिरी नहीं है। लेकिन वह झुकी ज़रूर है। और इतिहास में झुकी हुई कलम कभी सम्मान से याद नहीं की गई।
✒️ “अब फैसला हमें करना है—सिक्के को भारी मानें या सच को।….. संजय सिंह।






