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भारत के कदम पीछे खींचते ही चीन की ओर मुड़े ये कंटेनर कैसे, क्‍या है इनमें? समंदर में लगी कतार

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पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते रूस के यूराल्स तेल का निर्यात प्रभावित हुआ है। भारत की ओर से खरीद कम करने के बाद तेल से लदे टैंकर चीन के पूर्वी तट पर जमा हो गए हैं। यह स्थिति चीनी रिफाइनरियों के लिए अनोखी है, जो दूरी और गुणवत्ता के कारण इस तेल को कम पसंद करते हैं।
नई दिल्‍ली: पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों ने रूस को फंसा दिया है। इसका सबसे बड़ा असर उसके कच्‍चे तेल (क्रूड) निर्यात पर पड़ता दिख रहा है। रूस के प्रमुख यूराल्‍स तेल से लदे टैंकरों का एक बेड़ा चीन के पूर्वी तट के पास पहुंच गया है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भारत ने पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद इसकी खरीद कम कर दी है। वह इस तेल का सबसे बड़ा खरीदार था। केप्‍लर के अनुसार, बुधवार तक कम से कम पांच जहाज पीले सागर (येलो सी) में खड़े थे। इनमें लगभग 34 लाख बैरल तेल था। यह पिछले हफ्ते के मुकाबले दोगुना है। पिछले पांच सालों में इस क्षेत्र में यह यूराल्‍स तेल की सबसे बड़ी मात्रा है। जहां जहाज खड़े हैं वह इलाका शेडोंग प्रांत के पास है, जो स्वतंत्र तेल रिफाइनरियों का एक प्रमुख हब है।
क्‍यों पैदा हो गई है अजीब स्‍थ‍ित‍ि?
चीन के तट पर यूराल्‍स तेल का यह जमावड़ा अनोखी स्थिति है। दुनिया भर के तेल व्यापारियों की इस पर नजर है। ऐसा इसलिए है क्योंकि चीनी रिफाइनर आमतौर पर पश्चिमी बंदरगाहों से दूर से लोड किए गए यूराल्‍स तेल के खरीदार नहीं होते हैं। वे रूस के पूर्वी बंदरगाहों से आने वाले कच्चे तेल को पसंद करते हैं। इसकी वजह यह है कि वे पास हैं और उनमें डीजल की मात्रा अधिक होती है।
भारत के रूसी तेल आयात में बड़ी कमी
स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, इस महीने भारत की ओर से यूराल्‍स तेल का आयात 8,00,000 बैरल प्रतिदिन होने की उम्मीद है। यह जून में 20 लाख बैरल प्रतिदिन के टॉप से काफी कम है।
यह स्थिति पश्चिमी देशों की ओर से रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों का सीधा नतीजा है। इन प्रतिबंधों के कारण रूस को अपने तेल के लिए नए खरीदार खोजने पड़ रहे हैं। भारत जैसे पारंपरिक खरीदारों के पीछे हटने से रूस के यूराल्‍स तेल का प्रवाह चीन की ओर बढ़ गया है।

हालांकि, चीनी रिफाइनर इस तेल को खरीदने में उतनी दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं, जितनी भारत दिखा रहा था। इसका मुख्य कारण दूरी और तेल की क्‍वालिटी है।

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